भाग- 2 : श्री राम जन्मस्थान ‘संघर्ष-गाथा’

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अनिल त्रिपाठी

(जन्मभूमि की महिमा और महत्व को जानते हुए जलील ने मन ही मन इस जगह पर ख़ुर्द या छोटा मक्का फ़रोग़ करने का ज़लील-घटिया इरादा ठान लिया…से आगे )

उसने ख्वाज़ा कज़ल अब्बास से अपनी योजना के बारे में बताते हुए कहा – ” मूसा अयोध्या का ये रामजन्मस्थान हिंदुस्तान में हिन्दू आस्था का मरकज़ी निशान है अगर यहाँ मस्जिद तामीर कर दी जाय तो हिंदुस्तान में इस्लाम का परचम ताक़यामत बुलंद रहेगा। इसके सबाब में हमे जन्नत तो हासिल होगी ही साथ ही मस्ज़िद बन जाने पर महात्मा श्यामनन्द की जगह भी हम दोनों को हासिल हो जाएगी “।
सिद्धियां हासिल करने के लिए एक वक़्त इस्लाम को छोड़ने तक के ख़्वाहिशमंद ख्वाज़ा कज़ल अब्बास मूसा को जलालशाह की ये इस्लामी तरतीब इस क़दर भायी कि उसके अंदर का ‘पक्का मुसलमान’ जागने में ज़रा भी देर नहीं लगी। दोनों मिलकर अपनी इस्लामी तदबीर को अंजाम देने के मिशन में जुट गए। इसी बीच उदयपुर के महाराणा संग्राम सिंह उर्फ़ राणासाँगा और बाबर के बीच आगरे के पास फतेहपुर सीकरी में भीषण युद्ध हुआ।

इस युद्ध में बुरी तरह हारने और गंभीर रूप से होने के बाद बाबर वहाँ से भाग निकला। उसने अयोध्या आकर जलालशाह और मूसा की शरण ली। इस दरम्यान जलालशाह ने बाबर पर अपना प्रभाव डालते हुए उसे और बड़ी सेना ले कर युद्ध करने की सलाह दी साथ ही ये आशीर्वाद भी दिया कि इस बार उसकी जीत सुनिश्चित है। जलालशाह के आशीर्वाद से उत्साहित बाबर ने इस बार अपने छह लाख सैनिकों की सेना इकट्ठा कर राणासाँगा पर धावा बोल दिया। राणासाँगा की सेना में मात्र तीस हजार सैनिक थे। हालाँकि इस युद्ध में राणासाँगा की हार हुई लेकिन कितना भीषण युद्ध हुआ और वीर राजपूत लड़ाके कितनी बहादुरी से लड़े इस बात का अंदाज़ इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब युद्ध समाप्त हुआ तो जहां राणासाँगा के छह सौ सिपाही जीवित बचे थे वहीं बाबर की सेना में भी मात्र नब्बे हज़ार सैनिक ही जीवित बचे थे। इसका सीधा सा अर्थ है कि महज़ उनतीस हज़ार चार सौ राजपूत बलिदानियों ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने से पहले पांच लाख दस हज़ार इस्लामी-आक्रांताओं को मौत के घाट उतार दिया था।

इसके बावजूद बाबर की इस जीत में जलालशाह और मूसा की सिद्धियों का आशीर्वाद भी शामिल था जिसका शुक्रिया अदा करने के लिए बाबर एक बार फिर अयोध्या आया। इस बार मिलने पर जलालशाह ने बाबर को राम जन्मस्थान पर इस्लाम का परचम बुलंद करने की अपनी योजना के बारे में बताया। बाबर ने जलालशाह से इस योजना को धीरे धीरे बहुत एहतियात के साथ परवान चढ़ाने की गुज़ारिश करते हुए वापस दिल्ली जाने से पहले अपने ख़ास वज़ीर मीर बाकी खां को अयोध्या में रहकर ये काम पूरा करने का आदेश दिया। मीर बाकी का साथ पाकर जलालशाह ने अयोध्या को ख़ुर्द मक्का के रूप में तब्दील करने की अपनी बे-ईमान कोशिशों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। सबसे पहले अयोध्या में प्राचीन इस्लामिक ढर्रे की लम्बी लम्बी कब्रों को बनवाया गया, जिनमे दफ़नाने के लिए दूर दूर से मुसलमानों के शव अयोध्या लाये जाने लगे। धीरे धीरे पूरी रामनगरी को मुसलमानों की कब्रों से पाट दिया गया।

(उन कब्रों और मज़ारों में से कुछ तो आज भी अयोध्या में अयोध्या नरेश के महल के आस पास के इलाके में देखी जा सकती हैं।)
राम की नगरी अयोध्या को कब्रों से पाटने की असहनीय ख़बर पाकर देश भर के हिंदुओं में दुःख के साथ रोष पनपने लगा। यह देख मीर बाकी ने जलालशाह से कहा कि इससे पहले कि हिंदुओं का ग़ुस्सा ज़्यादा बढ़े और वो विरोध के लिए अयोध्या में इकठ्ठा हों हमे ये मन्दिर अब जल्द से जल्द तोड़ देना चाहिए। जलालशाह और ख्वाज़ा कज़ल अब्बास मूसा ने मीर बाकी के साथ मिलकर आनन-फ़ानन मन्दिर तोड़ने की योजना बनाई। इस योजना की भनक जब बाबा श्यामनन्द जी महाराज को लगी और इसमे अपने ही उन दो मुस्लिम शिष्यों की संलिप्तता के बारे में मालूम हुआ तो अपार कष्ट के साथ ही कपटियों को शिष्य बनाने के अपने निर्णय पर बहुत पछतावा हुआ, किंतु इससे अब क्या होने वाला था। इस विश्वासघात की पीड़ा से विह्वल उन्होंने मूसा खान और जलालशाह से कहा ” मेरी दी सिद्धियाँ तुम्हारे किसी काम न आएँगी। तुम अपने कुत्सित मन्तव्य में कभी सफल नहीं होगे।” इसके बाद वो तपस्या करने हिमालय की तरफ़ कूच कर गए।

कहते हैं हिमालय जाने से पहले महात्मा श्यामनन्द जी ने रामलला की मूर्तियाँ सरयू में प्रवाहित कर दी थीं किंतु आगे के घटनाक्रम से इस बात की पुष्टि नहीं होती। योजनानुसार अगले ही दिन मीर बाकी अपने चुनिंदा सिपाहियों को लेकर जन्मस्थान मन्दिर तोड़ने पँहुच गया।
मंदिर के निहत्थे पुजारी द्वार पर डटकर खड़े हो गए। उन्होंने कहा किसी भी विधर्मी को रामलला-मंदिर में प्रवेश हमारी मृत्यु के बाद ही मिल पाएगा। जलालशाह के इशारे पर मीर बाकी के सैनिकों ने उन चारों पुजारियों के सर कलम कर दिए। इसके बाद मीर बाकी और उसके सिपाहियों ने मन्दिर में जमकर लूटपाट की, काफ़ी तोड़फोड़ भी हुई किंतु भवन की मज़बूती के कारण वो उसे गिरा पाने में कामयाब नहीं हो सके। बताने की ज़रूरत नहीं कि जलालशाह और मूसा नाम के दोनों इस्लामी रँगे सियार इस पूरे क्रियाकलाप में पूरी तरह शामिल थे।
इसी के साथ शुरू होता है राम जन्मस्थान को बचाने के लिए हिन्दू बलिदानों का सिलसिला। राम जन्मस्थान मन्दिर के चारों पुजारियों द्वारा दी गई अपने प्राणों की आहुति ही जन्मस्थान रक्षार्थ दिया गया पहला बलिदान था।

इस हृदयविदारक घटना की ख़बर फैलते ही देश भर का हिन्दू उद्वेलित हो अयोध्या पँहुचने लगा। ये देख जलालशाह,मूसा खान के साथ ही मीर बाकी भी घबरा उठा। उसने फौरन बाबर से मदद की गुहार लगाई। ये ख़बर पाकर बाबर के माथे पर भी चिंता के लकीरें उभर आईं।
उसे अच्छी तरह ये आभास था कि धार्मिक भावनाएं आहत होने से अगर परे देश के हिंदुओं का ध्रुवीकरण हो गया तो ऐसी स्थिति में उसके लिए दिल्ली की गद्दी बचाए रखना भी टेढ़ी खीर होगा। उसने फ़ौरन देश के अन्य प्रान्तों के राम भक्तों को अयोध्या तक पँहुचने से रोकने के लिए शाही फ़रमान जारी किया। इस बात की तस्दीक़ बीसवीं सदी के अत्यंत प्रमाणिक लेखक श्री स्वामी सत्यदेव परिब्रापजक जी द्वारा लिखित धारावाहिक लेख “श्री राम की अयोध्या” से होती है। इस धारावाहिक लेख का प्रकाशन ‘मार्डन रिव्यू’ नाम के पत्र ने किया था। पत्र में 6 जुलाई 1924 को प्रकाशित अंक में स्वामी जी कहते हैं,वो अपने किसी शोध कार्य के सिलसिले में दिल्ली में उपलब्ध पुराने मुगलकालीन कागज़ात खंगाल रहे थे। इस उपक्रम में मुगलकालीन सरकारी कागजातों के बीच उनके हाथ एक अतिमहत्वपूर्ण दस्तावेज़ लगा। यह ‘लिथो प्रेस’ द्वारा प्रकाशित फ़ारसी भाषा में लिखित बाबर का एक शाही फ़रमान था जिसपर शाही मुहर भी लगी थी। फ़रमान अयोध्या स्थित श्री राम जन्मस्थान मंदिर गिराकर उसकी जगह मस्ज़िद बनाने के बारे में शाही हुक्मरानों को जारी किया गया था। मॉर्डन रिव्यू में प्रकाशित सन्दर्भित लेख में उस फ़रमान का हिंदी अनुवाद कुछ इस प्रकार था।

“शहंशाहे हिंद मालिकूल जहाँ बाबर के हुक्म से हज़रत जलालशाह के हुक्म के बमुजिव अयोध्या के राम जन्मभूमि मन्दिर को मिसमार करके उसी जगह पर उसी के मसाले से मस्ज़िद तामीर करने की इजाज़त दे दी गयी है। बज़रिये इस हुक्मनामे के तुमको बतौर इत्तिला आगाह किया जाता है कि हिंदुस्तान के किसी भी ग़ैर सूबे से कोई हिन्दू अयोध्या न जाने पावे। जिस शख़्स पर यह सुबहा हो कि वह अयोध्या जाना चाहता है फ़ौरन गिरफ़्तार करके दाख़िले ज़िंदा कर दिया जाए। हुक्म सख़्ती से तमिल हो फ़र्ज़ समझकर”। ( फ़रमान के आख़िर में बाबर की शाही मुहर)। बाबर के इस फ़रमान से ज़ाहिर होता है कि उसे भी इस बात का अहसास था कि श्री राम जन्मभूमि मन्दिर को तोड़ कर उस जगह पर मस्ज़िद तामीर करवाना उस समय भी कोई आसान काम नहीं था। बहरहाल इन तमाम बंदिशों और इस्लामी मुगलिया तरतीबों के बावजूद बड़ी संख्या में हिंदू अयोध्या पँहुचने लगा।

रामभक्त हिन्दू बलिदानी जन्मभूमि का कवच बन कर खड़े हो गए। इसी बीच इस भीषण अधार्मिक कृत्य की ख़बर बद्री नारायण की यात्रा पर निकले भीटी के राजा महताब सिंह को मिली। संयोग से वो उस समय अयोध्या के आस पास ही थे। उन्होंने अपनी यात्रा वहीं स्थगित करते हुए फ़ौरन अपनी सेना को बुला भेजा। हालाँकि राजा महताब सिंह की सेना छोटी ही थी किंतु देश के अन्य प्रांतों से पँहुच चुके और आस पास के हिंदुओं को मिलाकर एक लाख चौहत्तर हज़ार रामभक्तों का साथ पाकर उन्होंने गर्जना की कि हम अपने जीते जी रामलला का मंदिर ध्वस्त नहीं होने देंगे। रामजन्मभूमि को बचाने के लिए पहला बड़ा संघर्ष राजा महताब सिंह के नेतृत्व में ही हुआ। महताब सिंह की छोटी सी सेना के पास बहुत सीमित मात्रा में हथियार थे, अधिकांश रामभक्त तो निहत्थे ही थे। दूसरी तरफ़ मामले की गंभीरता को समझते हुए बाबर मीर बाकी की सहायता के लिए अब तक अयोध्या में अपने साढ़े चार लाख सैनिक भेज चुका था।

शाही सेना होने के कारण उनके पास भारी मात्रा में अस्त्र-शस्त्र गोला बारूद भी मौजूद था। ऐसे में युद्ध के एकपक्षीय होने का अनुमान था किंतु दो छद्मभेषी मक्कार मुस्लिमों द्वारा रचे गए कुचक्र के परिणामस्वरूप अपने आराध्य के जन्मस्थान पर हुए अतिक्रमण से आक्रोशित रामभक्तों ने यह कहते हुए राजा महताब सिंह का मनोबल दूना कर दिया कि ‘ राजा साहब हम रामभक्तों ने सौगंध ले रक्खी है, जब तक प्राण हैं जब तक हमारे शरीर में रक्त की एक भी बूँद बची रहेगी हम लड़ेंगे,अपने जीते जी हम मन्दिर नहीं गिरने देंगे।’ निहत्थे रामभक्तों में भी ये हौसला देख राजा महताब सिंह ने कहा ” मैं मोक्ष प्राप्ति कामना लिए ही तो बद्री-नारायण यात्रा पर निकला था,ऐसे में यदि रामजन्मस्थान रक्षार्थ लड़ते हुए वीरगति को भी प्राप्त हुआ तो सीधा स्वर्ग गमन ही होगा “।

भीषण युद्ध शुरू हो गया,एक तरफ शाही सेना और भरपूर गोला बारूद था तो दूसरी तरफ़ राजा महताब सिंह के नेतृत्व में थोड़े से सैनिक और लाखों रामभक्तों का अपने आराध्य के लिए प्राण न्योछावर करने का जज़्बा। मुगलिया अपेक्षा के विपरीत ये ऐतिहासिक संग्राम सत्तर दिनों तक चला। महताब सिंह समेत सभी रामभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति देने तक रामजन्म स्थान मन्दिर को गिरने नहीं दिया। ये रामभक्त किस वीरता से लड़े थे इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आख़िरी रामभक्त के बलिदान देने तक बाबर की साढ़े चार लाख की सेना के भी मात्र तीन हज़ार से कुछेक ज़्यादा सैनिक ही बचे थे। इतना भीषण प्रतिरोध और कत्ले आम देख घबराए मीर बाकी ने जलाल शाह और मूसा खान से कहा कि इससे पहले कि रामभक्त बलिदानियों का कोई और जत्था आ जाए हमे फ़ौरन से पेश्तर मन्दिर गिरा देना चाहिये। हिंदुओं से ख़ाली अयोध्या के बीच हिन्दू आस्था का केंद्र रामजन्मभूमि मन्दिर आनन फ़ानन में चारों तरफ से तोप लगवा के गिरवा दिया गया।

इस तथ्य की तस्दीक़ भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के जनक कहे जाने वाले ब्रिटिश इतिहासकार सर अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने गहन शोध के बाद अपने निष्कर्ष में अंकित की है। लखनऊ गजेटियर के 66 वें अंक के पृष्ठ 3 पर वो लिखते हैं – ” एक लाख चौहतर हजार हिंदुओं की लाशें गिर जाने के बाद ही मीर बाकी मंदिर ध्वस्त करने के अपने अभियान मे सफल हुआ। इसके बाद उसने जन्मभूमि के चारों ओर तोप लगवाकर मंदिर को ध्वस्त करवा दिया “। इसी सन्दर्भ में एक और अंग्रेज इतिहासकार हैमिल्टन बाराबंकी गजेटियर में लिखते हैं ” जलालशाह ने हिन्दुओं के ख़ून का गारा बना के लखौरी ईटों से मस्ज़िद की बुनियाद भरवाई थी ”। अंग्रेज़ इतिहासकारों के अलावा बाबरनामा में उल्लखित प्रसंग से भी इस बात की पुष्टि होती है कि बाबर के आदेश से ही जन्मभूमि-मंदिर का ध्वंस कर उसी स्थान पर विवादित ढांचा बनवाई गया। बाबरनामा के पेज नम्बर 173 पर बाबर लिखता है – ” हजरत कज़ल अब्बास मूसा आशिकन कलंदर साहब की इजाज़त से जन्मभूमि मंदिर को मिसमार कर मैंने उसी के मसाले से उसी जगह पर मस्जिद तामीर की। ध्यान रहे ये वही कज़ल अब्बास मूसा है जिसने जलालशाह से पहले जन्मभूमि के महंत श्यामनन्द जी महाराज का शिष्य बन उनके साथ विश्वासघात करते हुए अयोध्या में पैठ बनाई थी। अपनी साज़िश कामयाब हो जाने पर अब अपना रँगा चोला उतार ‘ आशिकान कलंदर साहब ‘ के अपने असली रूप में आ चुका था।

बहरहाल लाखों हिंदुओं के बलिदान के बाद आख़िरकार रामजन्मभूमि मन्दिर ध्वस्त हो चुका था और उन्ही रामभक्तों के ख़ून से बने गारे से वहाँ बनाई जाने वाली मस्ज़िद की नींव भरी जा चुकी थी। जलालशाह और मूसा खान के साथ मीर बाकी अब जल्द से जल्द मस्ज़िद की तामीर करने के साथ ही हिंदुस्तान में हमेशा हमेशा के लिए इस्लामी परचम बुलंद करने को बेताब थे। तेज़ी से काम शुरू हुआ, मगर यह क्या..!!!
निर्माण कार्य में लगे राजमिस्त्री और मजदूरों ने दिन भर में जितनी दीवार बनाई थी, अगली सुबह आने पर वो गिरी मिली। मीर बाकी घबरा गया उसने जलालशाह और मूसा खान से कहा ‘ लगता है हिंदुओं का कोई नया जत्था अयोध्या आ पँहुचा है, ज़रूर उन्ही लोगों ने यह दीवार गिराई है ‘। तीनों ने रात में कड़ा पनरा लगाने की बात कर काम शुरू करवाया। दिन भर की मशक्कत के बाद गिरी दीवार दोबारा चुन गई। शाम ढलने पर पहरे पर सिपाहियों को तैनात कर तीनों चले गए।

लेकिन यह क्या ! अगली सुबह फिर वो दीवारें गिरी मिलीं ! यह देख मीर बाकी पहरे पर तैनात सिपाहियों पर आग बबूला हो उठा ‘ कामचोरों..ज़रूर तुम रात सो गए होंगे, तभी काफ़िर दोबारा आकर दीवारें गिराने में कामयाब हो गए ‘। उसने पहरा और कड़ा करने का फ़ैसला किया,लेकिन दिन भर में चुनी गई दीवारें फिर गिरी मिलीं। उसने जलालशाह और मूसा खान के साथ ख़ुद भी वहीं रुककर निगरानी का फ़ैसला लिया लेकिन बावजूद इसके नतीज़े में कोई फ़र्क नहीं आया,दिन भर की गई चुनाई अगली सुबह गिरी मिलती। महीनों यही क्रम चलता रहा। अथक प्रयास और लाखों रूपये की बर्बादी के बाद भी मस्ज़िद की एक दीवार तक न बन पाई। वो हैरान हो गया, कि इतने सख़्त पहरे और निगरानी के बावजूद हर रात आख़िर दीवारें गिराता कौन है..! उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। झुंझलाहट में वो जलालशाह और मूसा खान पर भी बिफ़र पड़ा ‘ ये तो तै है कि यह किसी ऊपरी शै की करतूत है जो इतनी कोशिशों के बावजूद इतने दिनों में अभी तक मस्ज़िद की एक दीवार तक नहीं बन पाई ! तो फिर क्या ख़ाक सिद्धियाँ हासिल की हैं आप हज़रात ने’ ! क्या जवाब दूँगा मैं बादशाह सलामत को !
दोनों इस्लामिक गद्दारों के पास उसकी बात का कोई जवाब नहीं था,यक़ीनन उनकी सिद्धियाँ उस समय धरी की धरी रह गयी थीं।

(तथ्य सन्दर्भ – प्राचीन भारत इतिहास , लखनऊ गजेटियर, अयोध्या गजेटियर ,लाट राजस्थान , रामजन्मभूमि का इतिहास (आर जी पाण्डेय) , अयोध्या का इतिहास (लाला सीताराम) ,बाबरनामा, दरबारे अकबरी, आलमगीर नामा, तुजुक बाबरी।)

क्रमशः ….

( लेखक दूरदर्शन के समाचार वाचक/कमेंट्रेटर/वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र लेखक स्तम्भकार हैं।)

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