अनुवाद साहित्य की पुनर्रचना है – प्रो. मुरलीमनोहर पाठक*

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  • अंग्रेजी विभाग में पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का आयोजन

एनआईआई ब्यूरो।

गोरखपुर। अनुवाद अन्तरानुशासनिक भाषा एवं साहित्य का सबसे बड़ा क्षेत्र है। हर भाषा के सौंदर्य को अन्य भाषा में लाया जाना चाहिए, जिससे साहित्य एवं भावनाओं का उत्तरोत्तर विकास हो। पत्रिकाओं का प्रकाशन, श्रेष्ठ अनुवादों की परंपरा, उपन्यास, कहानी की परंपरा अन्य भाषाओं से भारतीय भाषाओं में स्थानांतरित हुई है इसे हिंदी, संस्कृत, उर्दू भाषाओं के अनेक उदाहरण से सामने लाना चाहिए। छंदों की परंपरा संस्कृत से हिंदी एवं हिंदी से उर्दू में पहुंचती है।

उक्त वक्तव्य दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर के यूजीसी एचआरडीसी एवं अंग्रेजी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हो रहे पुनश्चर्या कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र को बतौर मुख्य अतिथि लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने दिया।

विशिष्ट अतिथि के रुप में लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग की पूर्व अध्यक्ष सरस्वती सम्मान प्राप्त प्रो. निशि पांडेय ने कहा कि भाषाओं के आपसी संवाद से भारतीय भाषाओं का विकास हुआ है। शिक्षा के विकास के साथ ही देश का विकास होगा। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भाषाएं केंद्र में हैं। विभिन्न भाषाओं एवं साहित्य में समानता के बिंदु तलाशना होगा। अपनी सभ्यता के विकास में दूसरी सभ्यता को देखना चाहिए। डायस्पोरा स्टडी, कल्चरल स्टडी की उच्च शिक्षा में आवश्यकता है। साहित्य में इंटरडिसिप्लिनरी और मल्टीडिसिप्लनरी के महत्व को बढ़ाना होगा।

विशिष्ट अतिथि इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के आचार्य योगेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि हिंदी, भाषाओं में लोकतंत्र का प्रतीक है। वैश्वीकरण की ताकत से हिंदी का विस्तार हुआ है। हिंदी का संस्कृत से गहरा संबंध है। अनुवाद और गीतों का नया स्वरूप हिंदी का अधुनातन क्षेत्र है। हिंदी की स्वीकृति का प्रमाण बुकर पुरस्कार है।

कार्यक्रम में पुनश्चर्या कार्यक्रम के समन्वयक एवं अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष प्रो. अजय कुमार शुक्ला ने विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कार्यक्रम के अंतर्गत भाषा एवं साहित्य के विभिन्न अन्तर्विषयक आयामों पर विमर्श किया जाएगा। इसमें देश के विभिन्न महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालय के पचास से अधिक शिक्षक प्रतिभाग कर रहे हैं।

यूजीसी एचआरडीसी के निदेशक रजनीकांत पांडे जी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य मनुष्य की मनुष्यता को विस्तारित करता है। उपनिवेशवादी सोच को साहित्य से समाप्त होना चाहिए।

कार्यक्रम का संचालन हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ अखिल मिश्र ने किया। धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम समन्वयक द्वारा किया गया।

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