सर्वार्थ सिद्धि और अमृत योग में बासंतिक नवरात्र 9 अप्रैल से 17 अप्रैल को समापन एवं हवन

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नवरात्र व्रत का पारण 18 मार्च, बृहस्पतिवार को

आचार्य पंडित शरद चंद्र मिश्र

अध्यक्ष – रीलीजीयस स्कॉलर्स वेलफेयर सोसायटी

इस वर्ष बासंतिक नवरात्र मंगलवार से प्रारंभ हो रहा है। मंगलवार से नवरात्र का आरंभ होने से माता दुर्गा जी का वाहन अश्व ( घोड़ा) है।यह बहुत शुभता का प्रतीक नहीं है। इसलिए प्राकृतिक आपदाओं की सम्भावना बन सकती है।नवरात्र में तीन तिथियों का बड़ा महत्त्व है। ये तिथियां महासप्तमी,महा अष्टमी और महा नवमी हैं। इसमें दो तिथियां महा सप्तमी और महा नवमी को शुभ दिन सोमवार और बुधवार है तथा सर्वार्थ सिद्धि योग तथा अमृत योग में बासंतिक नवरात्र के आरंभ होने से वर्ष अनुकूल ही रहेगा। नववर्ष और बासन्तिक नवरात्र 9 अप्रैल से हो रहा है। इस दिन सूर्योदय 5 बजकर 46 मिनट बजे और प्रतिपदा तिथि का मान सम्पूर्ण दिन और रात्रि में 9 बजकर 44 मिनट तक, रेवती नक्षत्र प्रातः काल 8 बजकर 9 मिनट तक, पश्चात अश्विनी नक्षत्र। वैधृति योग दिन में 3 बजकर 17 मिनट पश्चात विषकुम्भ योग है।इस दिन नवरात्र व्रत के निमित्त कलश की स्थापना की जाएगी।इस वर्ष तिथियों में ह्रास और वृद्धि का क्रम नहीं है जैसा कि विगत कई वर्षों में रहा है। नवरात्र में सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथियों का सर्वाधिक महत्त्व है।

महासप्तमी विचार

दिनांक 15 अप्रैल सोमवार को महासप्तमी व्रत का दिन है।इस दिन सूर्योदय 5 बजकर 42 मिनट पर और सप्तमी दिन में 3 बजकर 38 मिनट,पश्चात अष्टमी तिथि है।इस दिन अर्धरात्रि में अष्टमी होने से महानिशा पूजा तथा बलिदानिक क्रिया इसी दिन सम्पन्न होगी।

महाष्टमी विचार

यह दिनांक 16 अप्रैल को है।इस दिन सूर्योदय 5 बजकर 41 मिनट पर और अष्टमी तिथि दिन में 4 बजकर 17 मिनट नवमी तिथि। उदयातिथि में अष्टमी होने से महाष्टमी व्रत के लिए यही दिन मान्य रहेगा।जो आदि और अंत का नवरात्र व्रत करते हैं, उनके लिए यह दिन सर्वोत्तम है।

महानवमी विचार

17 अप्रैल दिन बुधवार को है। इस दिन भी सूर्योदय 5 बजकर 40 मिनट और नवमी तिथि सायंकाल 5 बजकर 22 मिनट है। सूर्योदय से लेकर सांयकाल तक नवमी तिथि विद्यमान होने से यह महानवमी के लिए ग्राह्म है। जो साधक प्रथम और अंतिम दिन नवरात्र व्रत रखना चाहते हैं, वे 9 अप्रैल को और 16 अप्रैल को व्रत रखेंगे। विश्वरुप निबंध में कहा गया है कि देवी के उद्देश्य से अशौच हो जाने पर भी पूजन कर्म और दान करना चाहिए, इसमें कोई दोष नहीं होता है। लेकिन अशौच होने पर स्वयं न करके ब्राह्मण के द्वारा नवरात्र के समस्त कार्य संपादन कराएं, ऐसा लिखा हुआ है। यदि पूजन आरंभ कर दिया गया वो अथवा आरंभ न किया गया हो और इस परिस्थिति में अशौच हो जाए तो ब्राह्मण द्वारा ही पूजन कर्म कराएं, किंतु हवन और ब्राह्मण भोज अशौच के बाद ही कराएं। इस प्रकार स्त्रियों के रजोदोष हो जाने पर उपर्युक्त व्यवस्था से ही पूजनादि सम्पन्न कराएं।

तिथि दो प्रकार की होती है। एक सम्पूर्णा और दूसरा खण्डा ।वाले दिन के सूर्योदय से दूसरे दिन के सूर्योदय पर्यन्त तिथि रहे, वह पूर्णा कही गई है। सूर्योदय से आरंभ कर सूर्यास्त तक रहने वाली तिथि भी , दिन के काम के लिए पूर्णा ही कहीं गई है। यदि कोई तिथि सूर्योदय से आरंभ कर मध्यान्ह तक हो, तो मध्यान्ह से पूर्व कार्य करने के लिए वह पूर्णा ही मानी जाती है। इससे भिन्न तिथि खण्डा कहलाती है।

जगज्जननी दुर्गा का आवाहन, विसर्जन आदि समस्त कार्य सूर्य के उदय होने वाली तिथि में करना चाहिए। नवरात्र व्रत के शुभारंभ में यदि प्रतिपदा तिथि अमावस से युक्त हो, तो नहीं करना चाहिए। द्वितीया युक्त प्रतिपदा इसके लिए प्रशस्त है। दूसरे दिन यह प्रतिपदा यदि एक मुहुर्त भी रहे तो उस दिन नवरात्र व्रत का आरंभ श्रेष्ठ है।

कलश स्थापन

नवरात्र में कलश स्थापन दिन में ही किया जाता है। रात्रि में कलश स्थापन का निषेध है। इस वर्ष सूर्योदय 5 बजकर 46 मिनट बजे है और सूर्यास्त सांयकाल 6 बजकर 14 है।इस बीच कभी भी कलश का स्थापन किया जा सकता है। परंतु द्विस्वभाव लग्न कलश स्थापन के लिए अत्यंत उत्तम माना गया है। अभिजीत मुहूर्त दिन में 11 बजकर 36 मिनट में 12 बजकर 24 मिनट तक है। इसे कलश स्थापन के लिए अत्यंत श्रेयस्कर माना जाता है।

नवरात्रि व्रत की पूजा परम सिद्धि दायिनी है। इसमें नौ दिनों तक नवरात्रि व्रत किया जाता है। नवरात्र व्रत करने वाले को नौ दिनों तक केवल एक समय भोजन करना चाहिए। नवरात्र व्रत में जो नौ तिथियों में उपवास नहीं कर सकते हैं वह यदि सप्तमी, अष्टमी और नवमी- इन तीन तिथियों में उपवास करें तो भी उनकी कामना सिद्ध हो जाती है। एक समय भोजन करके या रात्रि में भोजन करके अथवा बिना मांगे जो मिल जाए उसी को प्राप्त करके जगज्जननी भगवती दुर्गा की पूजा सभी सनातन धर्म के लोगों को प्रसन्नता पूर्वक, भक्ति भाव से ग्राम, नगर, घर या शक्तिपीठों पर सम्पन्न करनी चाहिए।

शास्त्र विधि के अनुरूप पूजा करने में असमर्थ व्यक्ति गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पंचोपचार पूजा करें ।यदि पंचोपचार पूजा भी संभव न हो तो केवल पुष्प और जल से ही पूजा करे। पुष्प और जल के अभाव में केवल भक्ति भाव से( हाथ जोड़कर) ही देवी पूजन करे। लेकिन प्रत्येक सनातन धर्म के माननेवाले को देवी की पूजा अवश्य करनी चाहिए।भविष्य पुराण में कहा गया है नवरात्र में तिथि कम हो अथवा अधिक हो तो भी प्रतिपदा से आरंभ करके नवमी पर्यन्त पूजन सम्पन्न करें।चाहे 8 दिन का नवरात्र हो या नौ दिनों का या वृद्धि क्रम में दस दिनों का हो, तो उसमें नवरात्र से सम्बन्धित समस्त पूजन कार्य प्रसन्नता पूर्वक संपन्न करें।

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