मालीवाल के बहाने

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राजनीति में नारी-शोषण-एक विमर्श

दृश्य- 1

प्रेस कांफ्रेंस में कांग्रेस की नेता और राष्ट्रीय प्रवक्ता राधिका खेड़ा छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान घटित आपबीती सुनाते फ़फ़क पड़ती हैं। उनकी पार्टी के ही कुछ वरिष्ठ (तथाकथित नेताओं) और उनके लग्गू-भग्गू छुटभैये साथियों ने उन्हें कमरे में बंद कर उनके साथ पल्ले दर्जे की अभद्रता करते हुए उनका शोषण किया था। इससे भी शर्मनाक बात यह कि उन्होंने घटना के फ़ौरन बाद इस बात की जानकारी अपनी पार्टी के कई बड़े नेताओं (भूपेश बघेल, जयराम रमेश, पवन खेड़ा, सचिन पायलट समेत कई बड़े नाम गिनाए थे उन्होंने) को दी या देनी चाही, किंतु बजाय दोषियों के ख़िलाफ़ कार्यवाई करने के सभी ने समवेत स्वर से उन्हें चुप रहने की ताक़ीद की। अपनी ही पार्टी की महिला के साथ हुए इस अनैतिक, अमानवीय, घृणित और निंदनीय कृत्य पर ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ का नारा बुलंद करने वाली लड़की ‘बड़की बडराइन’ के भी कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। रेंगे भी कैसे, उनके लिये ये कौन सा नया और अनोखा मामला था..! नैना साहनी से लेकर राधिका खेड़ा तक कांग्रेस में महिला शोषण का लंबा इतिहास है।

दृश्य- 2

आम आदमी पार्टी नेता और राज्यसभा सांसद स्वाति मलीवाली बुझे चेहरे और बोझिल कदमों से चलते अरविंद केजरीवाल के घर में प्रवेश कर रही हैं। साथ में पुलिस है जो ‘सीन रिक्रिएशन’ के लिये उन्हें अरविंद केजरीवाल के घर लेकर आई है।

13 मई 2024 की सुबह अरविंद केजरीवाल से मिलने उनके घर आयी थीं। इसी दौरान कुछ अप्रत्याशित घटित हुआ। घटना के फौरन बाद स्वाति ने पुलिस को लगाते हुए सूचित किया कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर पर केजरीवाल के मौजूद रहते उन्हीं के निर्देश पर उनके सेकेट्री विभव कुमार ने स्वाति की जम के कुटाई की है। इस दौरान उन्होंने उनपर न केवल झन्नाटेदार थप्पड़ों की झड़ी लगाई बल्कि गलत इरादे से उनकी छाती और ‘निचले प्राइवेट पार्ट’ पर लात-घूंसों से प्रहार करते शोषण के अन्य कुत्सित प्रयास भी किये हैं। स्वाति की इस संवेदनशील सूचना पर पुलिस मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर पँहुची। वहाँ से स्वाति को लेकर थाने आई। इससे पहले की स्वाति इस शर्मनाक घटना की लिखित रिपोर्ट दर्ज करातीं, उनके पास ‘किसी का फोन’ आ गया और वो बिना रिपोर्ट दर्ज कराये ही अपने घर चली गईं। अगले दिन ज़मानत पर ही बाहर आम आदमी पार्टी के एक अन्य नेता संजय सिंह ने आनन फानन एक प्रेस कांफ्रेंस बुला घटना की स्वीकारोक्ति करते हुए बताया – “कल मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर पर उनकी पार्टी की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल के साथ मुख्यमंत्री के सेक्रेटरी विभव कुमार ने ‘बहुत बदतमीज़ी करते हुए अभद्र-अशोभनीय व्यवहार’ किया है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण घटना का गम्भीर संज्ञान लेते हुए कहा है कि मामले में सख़्त कार्यवाई की जायेगी।”

उलटबांसी देखिये कि एक तरफ़ प्रेस कांफ्रेंस में केजरीवाल के हवाले से संजय सिंह दोषी (विभव कुमार) के ख़िलाफ़ सख़्त कार्यवाई का भरोसा दे रहे थे तो दूसरी तरफ केजरीवाल उसी विभव कुमार को हवाई सैर कराते अपने चुनावी दौरे में साथ लिये घूम रहे थे। ऐसा विरला उदाहरण सिर्फ़ केजरीवाल ही पेश कर सकते हैं। स्वाति मलीवाल के घटनाक्रम में कई पेचीदगियां हैं। स्वाति मालीवाल दिल्ली महिला आयोग की ‘विवादित अध्यक्ष’ रहने के साथ ही हाथरस से लेकर मणिपुर तक महिला सम्मान-अधिकार संरक्षण की बड़ी झंडा अलंबरदार रही हैं। स्वाति का थाने पँहुच कर भी रिपोर्ट न दर्ज कराने का कारण लोकलाज का भय कदापि नहीं था। दरअसल स्वाति का बिना रिपोर्ट दर्ज कराए ही घर चले जाना, और अगले दिन संजय सिंह की प्रेस कांफ्रेंस, थाने पर मौजूदगी के दौरान स्वाति के पास आये फोन पर मिले ‘आश्वासन’ का परिणाम था। इस आश्वासन के क्रियान्वयन की प्रतीक्षा में अगले दो दिन स्वाति पूरी तरह चुप्पी साधे रहती हैं। लेकिन इसी बीच घटनाक्रम में नया मोड़ तब आता है जब आम आदमी पार्टी की ही एक अन्य महिला नेता आतिशी इस मुद्दे के मुताल्लिक मीडिया में प्रकट होती हैं और स्वाति के आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते हुए उल्टे आरोप मढ़ देती हैं कि स्वाति ने भाजपा से मिलीभगत कर आम आदमी पार्टी के सुप्रीम कमांडर ‘सत्यता और सदाचार की साक्षात प्रतिमूर्ति’ अरविंद केजरीवाल को बदनाम करने के लिये ये स्वांग रचा है।

ज़ाहिर है स्वाति को थाने पर आए फोन पर मिला आश्वासन धराशायी होने के साथ ही मौखिक समझौता टूट चुका था। इस झटके से तिलमिलाई स्वाति उसी पुलिस को अपने घर बुला कर अपना विस्तृत बयान दर्ज कराती हैं जिससे लाख जतन के बावजूद पिछले दो दिनों से वो मिलने से इंकार कर रही थीं। अब दोनों खेमों की तलवारें म्यान से बाहर हैं। एक आरोप का जवाब दूसरे प्रत्यारोप से दिया जा रहा है। स्वाति मालीवाल का कहना है केजरी एंड कम्पनी झूठे आरोप मढ़ते उनके चरित्रहनन का प्रयास कर रही है। उन्होंने केजरीवाल को आगाह करते हुए कहा है कि उनका खेमा अनर्गल आरोप लगाना बंद करें अन्यथा वो ‘ऐसा खुलासा’ कर देंगीं कि केजरीवाल अपने घर में बीबी बच्चों को भी मुँह दिखाने काबिल नहीं रहेंगे। ‘ऐसा क्या है!’ ये तो राम जाने लेकिन ख़बर है इसके बाद से ‘सर जी’ को ‘साँप सूँघ गया’ है। ध्यान रहे ये वही स्वाति मालीवाल हैं जो खुलेआम बिंदास तरीक़े से अपने ही पिता द्वारा अपने शारीरिक और मानसिक शोषण का खुलासा करने से नहीं हिचकिचाईं थीं, तो ‘सर जी’ किस खेत की मूली हैं। बहरहाल मामला अदालत की चौखट पर है और दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप जाँच का विषय।

मामला राधिका खेड़ा का हो या स्वाति मालीवाल का। इन दोनों ही प्रकरणों में ध्यान देने योग्य बात यह है कि एन.डी.ए हो या इंडी गठबंधन, किसी भी दल या नेता ने न तो कोई बड़ा धरना प्रदर्शन किया न ही उस तरह का कोई कोहराम मचाया जैसा वो प्रायः एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिये करते रहते हैं। कारण इस समय देश मे चुनावी बयार बह रही है और महिला शोषण के ‘हम्माम में लगभग सभी नंगे’ हैं। नारी सम्मान-संरक्षण के हवन में इस समय आहुति डालने में ख़ुद का हाथ जलने का ख़तरा ज़्यादा है। नारी वंदन अभिनंदन की तुरही बजाने वाली भाजपा भी इस प्रकरण में आम आदमी पार्टी पर छोटे मोटे कंकड़ फेंक अरविंद केजरीवाल को घायल करने की तो कोशिश कर रही है, लेकिन बड़े पत्थर से प्रहार करे भी तो कैसे..! उसके अपने भी घर में स्वामी चिन्मयानंद, कुलदीप सेंगर, बृजभूषण शरण सिंह से लेकर (सहयोगी दल के) प्रज्वल रेवन्ना तक शीशे की कई बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ जो हैं !
रटगर्स यूनिवर्सिटी-न्यू ब्रंसविक में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर और हाल ही में राजनीति में महिलाओं की स्थिति पर पुस्तक लिखने वाली मोना लेना क्रुक द्वारा किये गये एक शोध के अनुसार पिछले दो दशक में राजनीति में जिस अनुपात में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है उससे कई गुना उनका उत्पीड़न और शोषण भी बढ़ा है। उनके ख़िलाफ़ विभिन्न प्रकार की हिंसा के मामले आकार ले रहे हैं। राजनीति में महिलाओं का शोषण कई रूपों में होता है यथा, शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, यौन, आर्थिक और लाक्षणिक। इन रूपों के अतिरिक्त इस सूची में आज एक और तरीका भी मज़बूती से अपने पाँव पसार रहा है, वो है ऑनलाइन शोषण। आधुनिकता और विकास की देन यह नया तरीका दुनिया भर में लोकतांत्रिक पतन का प्रमुख उपकरण बन एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है।

चूंकि ताज़ा तौर पर आम आदमी पार्टी की नेता स्वाति मालीवाल और कुछ समय पहले तक कांग्रेस प्रवक्ता रही और अब नई नवेली भाजपाई राधिका खेड़ा का मामला ज़ेरे बहस है इस लिये इस विमर्श को मैंने राजनीति तक ही सीमित रखा। जबकि सच यह है कि सामान्य जन-जीवन हो, अकादमिक कॅरियर, फ़िल्म जगत, साहित्यिक-सांस्कृतिक फ़लक, विधायिका, कार्यपालिका या फिर न्यायपालिका ही क्यों न हो, कोई भी महकमा इस समस्या से अछूता नहीं है। देश दुनिया मे महिलाओं का शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण कोई नई बात नहीं है। ये सदियों से होता चला आया है। ऐसा भी नहीं कि सिर्फ़ अनपढ़, कमज़ोर, पिछड़े या निचले तबके की महिलाएं ही इस ‘शगल’ का निशाना हों, बल्कि बड़ी संख्या में पढ़ी लिखी, आधुनिक, संपन्न, और संभ्रांत महिलाएं भी इस कुचक्र शिकार हैं।

सेंटर फॉर सोशल रिसर्च और यू.एन वूमेन सेल द्वारा किए गए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि महिला शोषण से सम्बंधित 90 प्रतिशत से अधिक वो मामले जो वास्तविक हैं लोकलाज या अन्य कारणों से सामने आते ही नहीं। शोषण से सम्बंधित जो दस प्रतिशत के करीब मामले सामने आते हैं ये वो होते हैं जिनमें करीब 95 प्रतिशत मामलों में अदालती कार्यवाही और ज़िरह के दौरान तथ्य सामने आते हैं कि अधिकांश महिलाएँ अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के तात्कालिक मोहपाश में पड़कर शोषण के इस दलदल में स्वयं धँसती हैं। निहित स्वार्थ, नियुक्ति, प्रोन्नति, अर्थलाभ, शादी के झाँसे, सामाजिक सुरक्षा या शोशेबाज़ी के चक्कर में पहले तो वो स्वेच्छा से या संयोगवश प्रभावशाली या दबंग व्यक्तियों के संपर्क में आती हैं, उनका संरक्षण स्वीकार करते स्वयं को अर्पित करती हैं किंतु बाद में आश्वसन पूरा न होने पर उन्हें आभास होता है कि वो शोषण का शिकार बन चुकी हैं। लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। क्योंकि एकाध बार तो बलात ज़ोर-जबर्दस्ती हो सकती है किंतु लंबे समय तक ऐसा ‘शोषण’ सहमति के बिना संभव नहीं। यही कारण है कि शोषण के अधिकांश आरोपी दोष सिद्ध न हो पाने की दशा में सज़ा से बच निकलते हैं।

अदालती कार्यवाई के दौरान कुछ ऐसे भी मामले सामने आये हैं जिनमें मनवांछित मंतव्य सिद्ध न होने पर महिला ने ही सच्चे-झूठे आरोप मढ़ पुरुष को फँसा दिया। राजनीति के क्षेत्र में तो ‘हनीट्रैप’ के शिकार लोगों की लंबी फ़ेहरिस्त है। कहते हैं फिल्में समाज का आईना होती हैं। इस संदर्भ में एक बांग्ला फ़िल्म का वो दृश्य याद आ रहा है जिसमें दो महिला पात्रों के बीच संवाद होता है। पहली कहती है – “अपने फ़ायदे के लिये तू जिस तरह बिछ जाती है, तुझे बुरा नहीं लगता.!” दूसरी जवाब देती है -“इसमें बुरा क्या लगना.? देख यार वैसे भी ये काया फ़ानी है एक दिन फ़ना हो जानी है। जब तक ये रूप-रंग और शारीरिक संरचना का आकर्षण है तभी तक इसकी वकत है, उसके बाद कौन पूछने वाला है हमें..! तो इसका फ़ायदा उठाने में हर्ज़ क्या है..!” हालाँकि हमारे समाज में ऐसी महिलाओं को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता, और ऐसा भी नहीं कि इनकी बहुतायत है लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हैं ऐसी भी महिलाएँ हमारे इसी समाज में जिन्हें अपने फ़ायदे या किसी अन्य को फ़ायदा (या नुकसान) पंहुचाने के लिये कभी ‘आम्रपाली तो कहीं ‘बसंतसेना’ बनने से भी गुरेज़ नहीं है। जहाँ तक राजनीति का सवाल है तो महिलाओं के लिये आज भी ये ‘काजल की कोठरी’ से कम नहीं।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार देशभर में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में 48 सांसद और विधायक आरोपी हैं। इनमें 45 विधायक और 3 सांसद हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा महाराष्ट्र के 12 विधायक और सांसदों पर महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामले दर्ज हैं। पार्टी की बात की जाय तो सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते यहाँ भी भाजपा पहले पायदान पर खड़ी है। भाजपा के सबसे ज्यादा 12 विधायक और सांसदों पर महिला शोषण के मामले दर्ज हैं। इसके बाद शिवसेना 7, टीएमसी 6 और कांग्रेस 4 का नम्बर आता है। महिला शोषण के मामले में देश की लगभग सभी पार्टियों में गजब की कदमताल दिखाई पड़ती है। 29 मामलों में अन्य राजनीतिक दलों के ‘माननीय’ भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए इस सूची में अपनी पार्टियों का ‘मान’ बढ़ा रहे हैं। ये तो वो सूची है जिसमें मात्र ‘माननीय’ शामिल हैं। जबकि नीचे से लेकर ऊपर तक हर स्तर पर, हर जगह ऐसे ‘महा-माननीयों’ की कदापि कोई कमी नहीं जो साथी सहकर्मी महिला के प्रति ‘गिद्धदृष्टि’ ही रखते हैं। कहने को समय के साथ अब हम सभ्य समाज का हिस्सा हैं किंतु कड़ुआ सच यह है कि इस मोर्चे पर आज भी हम न केवल संवेदनहीन, संवेदनाशून्य हैं बल्कि निर्लज्ज और नितांत असभ्य समाज हैं।

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